प्रधानमंत्री ने साहस और बुद्धिमत्ता पर बल देते हुए संस्कृत सुभाषितम् साझा किया
Naitik Chakravarti Times
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प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय मंच पर युवा और सामाजिक वर्गों को प्रेरित करने हेतु साहस और बुद्धिमत्ता के महत्व को रेखांकित किया और एक प्राचीन संस्कृत सुभाषित का उल्लेख किया।
राष्ट्रपति भवन के निकट आयोजित एक राष्ट्रीय मंच में प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में साहस और बुद्धिमत्ता को देश के विकास के दो मूल स्तम्भ के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आज के तेज़ी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में, राष्ट्र को प्रगति के पथ पर अग्रसर रखने के लिये नागरिकों में आत्मविश्वास और विवेकपूर्ण निर्णय‑क्षमता का विकास अनिवार्य है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री ने एक प्राचीन संस्कृत सुभाषित का उल्लेख किया, “धैर्यं धीरस्य बलम्” (धैर्य ही धीर का बल है), जिससे उन्होंने यह संदेश देना चाहा कि साहस केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि धैर्य और विचारशीलता से उत्पन्न होता है।
सुभाषित के साथ ही प्रधानमंत्री ने शिक्षा नीति में संस्कृत के पुनरुत्थान की दिशा में किए जा रहे कई कदमों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि सरकार ने विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में संस्कृत को वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल करने, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से भाषा के अध्ययन को सुलभ बनाने और युवा वर्ग में सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ाने के लिए विशेष पहल शुरू की हैं। इस पहल का उद्देश्य न केवल भाषा की रक्षा करना, बल्कि उसके माध्यम से भारतीय सभ्यता के मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का यह संदेश राष्ट्रीय स्तर पर आत्मविश्वास और नवाचार को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ सांस्कृतिक धरोहर को सुदृढ़ करने में सहायक होगा। कई सामाजिक संगठनों ने इस अवसर को युवा प्रेरणा के स्रोत के रूप में सराहा और कहा कि ऐसे सुभाषितों का प्रयोग सार्वजनिक संवाद में नई ऊर्जा का संचार कर सकता है। इस प्रकार, साहस और बुद्धिमत्ता के संगम को उजागर करते हुए, प्रधानमंत्री ने भारतीय परम्परा और आधुनिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की अपनी प्रतिबद्धता को पुनः सुदृढ़ किया।