प्रधानमंत्री ने संशय से उबरने और अनिश्चितता को अंगीकार करने पर बल देने वाला संस्कृत सुभाषितम् साझा किया
Naitik Chakravarti Times
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प्रधानमंत्री ने हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में एक प्राचीन संस्कृत सुभाषित का हवाला देते हुए समाज में संशय को दूर करने और अनिश्चितता को स्वीकार करने की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रधानमंत्री ने आज एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान एक प्राचीन संस्कृत सुभाषित का उल्लेख करते हुए यह संदेश दिया कि “संशय से उबरना और अनिश्चितता को अंगीकार करना ही प्रगति की कुंजी है।” यह कथन, जो “विश्वास के बिना भविष्य अज्ञात है” के रूप में जाना जाता है, ने उपस्थित नागरिकों और मीडिया के बीच गहरी चर्चा उत्पन्न की। प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्तमान वैश्विक चुनौतियों, जैसे जलवायु परिवर्तन, डिजिटल परिवर्तन और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच, नयी सोच और साहसिक निर्णयों की आवश्यकता है।
इस सुभाषित को साझा करने का उद्देश्य यह बताना था कि नीति-निर्माण में जोखिम और अनिश्चितता को नकारात्मक रूप में नहीं, बल्कि विकास के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि सरकार ने पहले से ही कई पहल शुरू की हैं—जैसे ‘डिजिटल इंडिया 2030’, ‘ग्रीन एनर्जी फंड’ और ‘स्मार्ट सिटी स्कीम’—जो अनिश्चितता के बीच नवाचार को बढ़ावा देती हैं। साथ ही, उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि वे अपने व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में भी संशय को दूर करें और परिवर्तन को स्वीकार करें।
इस भाषण पर विभिन्न राजनेताओं और समाजशास्त्रियों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। एक वरिष्ठ राजनेता ने कहा, “यह सुभाषित न केवल सांस्कृतिक विरासत को उजागर करता है, बल्कि यह हमारे समय की चुनौतियों के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका भी है।” वहीं, एक समाजशास्त्री ने उल्लेख किया कि ‘अनिश्चितता को अंगीकार करना’ की अवधारणा को शिक्षा और सार्वजनिक नीति में शामिल करना आवश्यक है ताकि नागरिकों में लचीलापन और अनुकूलनशीलता बढ़े। इस प्रकार, प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य एक प्रेरणादायक संदेश के रूप में सामने आया, जो समाज को नई दिशा और दृढ़ संकल्प की ओर ले जाने का उद्देश्य रखता है।