** यूपीएससी के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल पाठ
Naitik Chakravarti Times
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** प्रधानमंत्री ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के शताब्दी अवसर पर इतिहास, चुनौतियों और भविष्य की दिशा पर प्रकाश डालते हुए, प्रशासनिक कार्यक्षमता और नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने की अपील की।
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भारतीय प्रशासनिक सेवा (यूपीएससी) ने इस वर्ष अपने शताब्दी समारोह का आयोजन किया, जिसमें प्रधानमंत्री ने मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने प्रथम बार यूपीएससी के स्थापना‑साल 1926 से लेकर आज तक की यात्रा को संक्षेप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से ही यूपीएससी ने देश के शासन‑प्रणाली को सक्षम, निष्पक्ष और उत्तरदायी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस दौरान उन्होंने प्रशासनिक सेवा के मूल सिद्धांत—न्याय, पारदर्शिता और जनसेवा—पर ज़ोर दिया और कहा कि इन सिद्धांतों को आधुनिक तकनीकी उपकरणों और डेटा‑ड्रिवेन पॉलिसी‑मेकिंग के साथ जोड़ना आवश्यक है।
प्रधानमंत्री ने शताब्दी समारोह में अपने मूल पाठ में तीन प्रमुख बिंदुओं को उजागर किया: पहला, प्रशासनिक प्रशिक्षण में नैतिकता और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देना; दूसरा, डिजिटल इंडिया और एआई‑आधारित समाधान के माध्यम से सरकारी सेवाओं की पहुँच और गति को बढ़ाना; तीसरा, विविधता और समावेशिता को बढ़ावा देते हुए सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को साकार करना। उन्होंने विशेष रूप से युवा अभ्यर्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे "परिवर्तन के प्रेरक बनें, न कि केवल कार्यकर्ता।" इस संबोधन के बाद कई वरिष्ठ अधिकारियों और शैक्षणिक विशेषज्ञों ने इसे "भविष्य की प्रशासनिक दिशा-निर्देश" के रूप में सराहा, जबकि कुछ ने प्रशिक्षण में व्यावहारिक कौशल की अधिक आवश्यकता पर बल दिया।
समारोह के अंत में, प्रधानमंत्री ने सभी UPSC अभ्यर्थियों को शुभकामनाएँ देते हुए, उन्हें "देश की सेवा के पवित्र मिशन में निरंतर उत्कृष्टता प्राप्त करने" का आह्वान किया। इस शताब्दी समारोह और संबोधन को भारतीय प्रशासनिक सेवा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है, जो आगामी दशकों में सार्वजनिक प्रशासन के रूपांत