प्रधानमंत्री ने सत्य, ज्ञान और सदाचार के महत्व पर जोर देते हुए संस्कृत सुभाषितम् साझा किया
Naitik Chakravarti Times
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प्रधानमंत्री ने हाल ही में आयोजित राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच में एक प्राचीन संस्कृत सुभाषितम् का हवाला देते हुए सत्य, ज्ञान और सदाचार को राष्ट्रीय प्रगति की आधारशिला बताया।
राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच के मुख्य सत्र में प्रधानमंत्री ने उपस्थित विद्वानों, शिक्षकों और छात्रों को संबोधित करते हुए एक प्राचीन संस्कृत सुभाषितम् “सत्यमेव जयते, ज्ञानम् एव प्रकाशः, सदाचारः पथप्रदर्शकः” का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि यह श्लोक न केवल भारतीय सभ्यता की नैतिक नींव को दर्शाता है, बल्कि आज के वैश्विक प्रतिस्पर्धी माहौल में भी व्यक्तिगत और सामाजिक विकास के मुख्य स्तम्भ हैं। सत्य को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पारदर्शी शासन के साथ जोड़ा गया, जबकि ज्ञान को विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शिक्षा के निरंतर उन्नयन के रूप में प्रस्तुत किया गया। सदाचार को सामाजिक सामंजस्य, नैतिक नेतृत्व और सार्वजनिक सेवा के मूलभूत सिद्धांत के रूप में रेखांकित किया गया।
प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर सरकार की नई पहल का उल्लेख किया, जिसमें स्कूल पाठ्यक्रम में भारतीय दार्शनिक विचारों को समाहित करने, संस्कृत भाषा को पुनर्जीवित करने और नैतिक शिक्षा को प्राथमिकता देने के लिए विशेष कार्यक्रम शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इन पहलों का उद्देश्य युवा पीढ़ी को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हुए विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना है। साथ ही, उन्होंने विभिन्न राज्यों के शैक्षिक संस्थानों से सहयोग की अपील की, ताकि सत्य, ज्ञान और सदाचार के मूल्यों को राष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ किया जा सके। इस वक्तव्य को राष्ट्रीय मीडिया और सामाजिक मंचों में व्यापक समर्थन मिला, जहाँ कई विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना सामाजिक प्रगति और आर्थिक विकास दोनों के लिए आवश्यक है।
इस कार्यक्रम के अंत में, विभिन्न सांस्कृतिक समूहों ने सुभाषितम् पर आधारित कवि सम्मेलनों और शैक्षिक कार्यशालाओं का आयोजन किया, जिससे इस संदेश का प्रसार और गहराई से किया गया। इस प्रकार, प्रधानमंत्री का यह संदेश न केवल एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति रहा, बल्कि राष्ट्रीय नीति में नैतिक एवं शैक्षिक मूल्यों के एकीकृत करने की दिशा में एक स्पष्ट संकेत भी रहा।