** प्रधानमंत्री ने विनम्रता और निरंतर सीखने के महत्व को रेखांकित करते हुए एक संस्कृत श्लोक साझा किया
Naitik Chakravarti Times
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** प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति और सामाजिक नैतिकता पर अपने विचारों को सुदृढ़ करने के लिए एक प्राचीन संस्कृत श्लोक उद्धृत किया, जिसमें विनम्रता और सतत् सीखने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
** प्रधानमंत्री ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर अपने विचार व्यक्त करते हुए एक प्राचीन संस्कृत श्लोक—“विनयेनैव सिद्ध्यन्ति कार्याणि, निरन्तरं अध्ययनं फलप्रदं”—को साझा किया। इस श्लोक का शाब्दिक अर्थ है कि विनम्रता के बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता और निरंतर अध्ययन ही फलदायक परिणाम देता है। प्रधानमंत्री ने इस श्लोक को आधुनिक भारत की सामाजिक और शैक्षिक चुनौतियों के संदर्भ में प्रस्तुत किया, यह स्पष्ट करते हुए कि आज के युवा वर्ग को तकनीकी उन्नति के साथ-साथ नैतिक मूल्यों को भी अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आचरण में विनम्रता और ज्ञान की सतत खोज से भी निर्धारित होती है।
विनम्रता और निरंतर सीखने की अवधारणा पर इस पहल ने शिक्षा मंत्रालय के हालिया कदमों को पुनः सुदृढ़ किया है, जिसमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत जीवनभर सीखने को एक प्रमुख स्तम्भ माना गया है। इस नीति के अंतर्गत स्कूलों और विश्वविद्यालयों को कौशल विकास, नैतिक शिक्षा और डिजिटल साक्षरता को एकीकृत करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रधानमंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि इस श्लोक को विभिन्न शैक्षिक संस्थानों में पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है, जिससे छात्रों में आत्म-निरीक्षण और सतत् आत्म-विकास की भावना को प्रोत्साहन मिल सके।
समग्र रूप में, इस श्लोक के माध्यम से प्रधानमंत्री ने यह संदेश दिया कि व्यक्तिगत विनम्रता और निरंतर सीखना न केवल व्यक्तिगत सफलता की कुंजी है, बल्कि राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक विकास का भी आधारस्तम्भ है। इस विचारधारा को अपनाते हुए, सरकार विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक सुधार, कौशल प्रशिक्षण और नैतिक मूल्यों के प्रसार के लिए नई पहलें जारी करने की योजना बना रही है, जिससे भारत को वैश्विक मंच पर एक सक्षम और नैतिक नेता के रूप में स्थापित किया जा सके।