** प्रधानमंत्री ने साझा किया संस्कृत सूक्ति: संयमित वाणी‑मन, तप‑आत्मत्याग‑सत्यनिष्ठा पर प्रकाश
Naitik Chakravarti Times
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** राष्ट्रीय मंच पर प्रधानमंत्री ने एक प्राचीन संस्कृत सूक्ति उद्धृत कर संयमित भाषा, शुद्ध मन, कठोर तप, आत्म‑त्याग और सत्यनिष्ठा के मूल्यों को राष्ट्रीय पुनरुत्थान की दिशा में आवश्यक बताया।
** राष्ट्रीय सभा में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने एक प्राचीन संस्कृत सूक्ति को उद्धृत किया, जिसमें कहा गया है, “वाणी संयमी, मन शुद्ध, तप दृढ़, आत्म‑त्यागी, सत्यनिष्ठा अटल”। इस सूक्ति का अर्थ उन्होंने हिंदी में सरल शब्दों में समझाते हुए बताया कि व्यक्तिगत और सामाजिक प्रगति के लिए इन पाँच नैतिक सिद्धांतों का अनुपालन अनिवार्य है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर में ऐसे नैतिक मूल्यों का निरंतर उल्लेख मिलता है, जो आज की तेज़‑रफ़्तार और तकनीकी उन्नति के युग में नैतिक दिशा‑निर्देश प्रदान करते हैं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्र की प्रगति केवल आर्थिक आँकड़ों से नहीं, बल्कि नागरिकों के आंतरिक गुणों की सुदृढ़ता से निर्धारित होती है।
इतिहास में भी कई बार ऐसा देखा गया है कि संत, कवि और राजनेता ने समान सिद्धांतों को प्रमुखता दी है; महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद और अन्य राष्ट्रीय नायक ने भी संयम, सत्यनिष्ठा और आत्म‑त्याग को अपने सामाजिक कार्यों का आधार बनाया। इस संदर्भ में विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री द्वारा उद्धृत सूक्ति न केवल सांस्कृतिक पुनरुत्थान का संदेश देती है, बल्कि वर्तमान सामाजिक चुनौतियों—जैसे भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता और नैतिक पतन—के समाधान के लिये एक वैचारिक ढांचा भी प्रस्तुत करती है।
प्रमुख विचारकों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि सरकार द्वारा नैतिक शिक्षा को प्रमुखता देना आवश्यक है। कई शैक्षिक संस्थानों ने इस पर आधारित कार्यशालाओं और संवाद सत्रों का आयोजन करने का प्रस्ताव रखा है, जिससे युवा वर्ग में इन मूल्यों का प्रभावी प्रसार हो सके। इस प्रकार, प्रधानमंत्री की इस सांस्कृतिक पहल को राष्ट्रीय एकता और नैतिक पुनरुत्थान की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।