पर्यावरण और जलवायु गतिकी के भविष्य पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री का मूलभूत संबोधन
Naitik Chakravarti Times
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प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन के त्वरित समाधान और सतत विकास के लिए नई नीति दिशा‑निर्देश प्रस्तुत किए, जिससे वैश्विक सहयोग की आशा जगाई।
पिछले हफ्ते आयोजित “पर्यावरण और जलवायु गतिकी का भविष्य” अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के प्रधान मंत्री ने मुख्य भाषण दिया, जिसमें उन्होंने जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रभावों को रोकने के लिए त्वरित और समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया। सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, एशिया‑पैसिफिक देशों तथा कई विकासशील राष्ट्रों के प्रतिनिधि शामिल थे, और यह वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को घटाने, नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाने और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों को सुदृढ़ करने के लिए एक मंच प्रदान करता है। प्रधानमंत्री ने बताया कि भारत ने 2030 तक अपनी कार्बन तीव्रता को 45 % तक घटाने और 2070 तक शून्य उत्सर्जन हासिल करने के लक्ष्य को पुनः पुष्टि किया है, साथ ही सौर, पवन और हाइड्रोजन जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों में निवेश को दोगुना करने का इरादा जताया है।
संबोधित में उन्होंने जलवायु वित्त के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया, यह संकेत देते हुए कि विकसित देशों को विकासशील देशों को अनुकूलन और शमन कार्यों के लिए वादा किए गए फंडों का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना चाहिए। प्रधानमंत्री ने तकनीकी सहयोग, अनुसंधान एवं विकास, और विशेषकर युवा पीढ़ी की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने में विज्ञान‑आधारित नीति निर्माण और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी अपरिहार्य है। इस संबोधन के बाद कई देशों ने भारत के प्रस्तावित पहल को समर्थन देते हुए सहयोगी समझौतों की घोषणा की, जिससे वैश्विक जलवायु लक्ष्य की प्राप्ति में नई ऊर्जा का संचार हुआ।