युद्ध के बदलते स्वरूप के बीच स्वदेशी तकनीक के विकास और उसे अपनाने की गति बढ़ाने के लिए रक्षा क्षेत्र, शिक्षा जगत व रक्षा उद्योग के बीच करीबी सहयोग आवश्यक है: रक्षा मंत्री
Naitik Chakravarti Times
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रक्षा मंत्री ने कहा कि आधुनिक युद्ध की नई चुनौतियों से निपटने के लिए स्वदेशी प्रौद्योगिकी के विकास और उसके त्वरित अंगीकरण हेतु रक्षा, शिक्षा और उद्योग के बीच घनिष्ठ समन्वय अनिवार्य है।
रक्षा मंत्री ने हाल ही में एक बयान में बताया कि वैश्विक स्तर पर युद्ध के स्वरूप में हो रहे तेज बदलाव—जिसमें साइबर, हाइब्रिड और स्वायत्त प्रणालियों का बढ़ता महत्व शामिल है—के मद्देनजर स्वदेशी तकनीक के विकास और उसके त्वरित अपनाने के लिए रक्षा क्षेत्र, शिक्षा जगत और रक्षा उद्योग के बीच गहन सहयोग आवश्यक है। मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि केवल सरकारी उपक्रमों पर निर्भर रहकर स्वदेशी प्रौद्योगिकी को समय पर उपलब्ध कराना संभव नहीं है; इसके लिए विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और निजी उद्योगों को एकीकृत मंच पर लाया जाना चाहिए।
इस संदर्भ में, रक्षा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संगठन (DRDO) और प्रमुख विश्वविद्यालयों के बीच चल रहे शोध-प्रयोगशालाओं के उदाहरण को उद्धृत किया गया। मंत्री ने बताया कि पहले से ही एआई‑आधारित निर्णय‑सहायक प्रणालियों, साइबर‑सुरक्षा ढांचों और स्वायत्त ड्रोन के क्षेत्र में सफल सहयोग के परिणाम सामने आ रहे हैं। वे आगे कहते हैं कि इस प्रकार के सार्वजनिक‑निजी साझेदारी मॉडल को और भी विस्तारित करके, नई तकनीकों का परीक्षण, उत्पादन और तैनाती का चक्र कम किया जा सकता है।
साथ ही, मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वदेशी प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा देने के लिए उद्योग को प्रोत्साहन देने हेतु कर‑रियायतें, अनुसंधान‑विकास के लिए अनुदान और ‘क्लाउड‑फ्रेंडली’ बुनियादी ढाँचे का निर्माण आवश्यक है। वे आश्वस्त करते हैं कि यदि रक्षा, शिक्षा और उद्योग के बीच यह सहयोग सुदृढ़ होता है, तो न केवल भारत की रणनीतिक स्वायत्तता में वृद्धि होगी, बल्कि लागत‑प्रभावशीलता और रोजगार सृजन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय लाभ मिलेगा।