शुष्क‑भूमि विकास में सुदृढ़ संस्थाएँ, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और सामुदायिक कार्रवाई को अपनाना चाहिए, डीओएलआर के सचिव ने कहा
Naitik Chakravarti Times
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भूमि संसाधन विभाग के सचिव ने शुष्क‑भूमियों के सतत विकास के लिए संस्थागत शक्ति, डिजिटल सार्वजनिक प्लेटफ़ॉर्म और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को मुख्य स्तंभ मानते हुए नई रणनीति का आह्वान किया।
भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) के सचिव ने आज शुष्क‑भूमियों के विकास के लिए एक समग्र और नवोन्मेषी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि जल की कमी, मिट्टी की क्षरण और जलवायु परिवर्तन के कारण इन क्षेत्रों में कृषि उत्पादन और जीवन स्तर दोनों ही गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए केवल पारंपरिक जलसंधारण या बीज वितरण तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है; इसके बजाय सुदृढ़ संस्थाओं की आवश्यकता है जो नीति निर्माण, कार्यान्वयन और निगरानी में निरंतरता और पारदर्शिता सुनिश्चित कर सकें। विभाग के सचिव ने कहा कि मौजूदा संस्थागत ढाँचे को सुदृढ़ करके, विभिन्न सरकारी और गैर‑सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय को बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे शुष्क‑भूमियों में संसाधन प्रबंधन के लिए एकीकृत मंच स्थापित हो सके।
डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को इस प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा माना गया। सचिव ने उल्लेख किया कि भू‑सूचना प्रणाली (GIS), रिमोट सेंसिंग और मोबाइल‑आधारित डेटा संग्रहण के माध्यम से भूमि की जलवायु‑सहिष्णुता, जल उपलब्धता और फसल स्वास्थ्य की रीयल‑टाइम निगरानी संभव हो सकती है। इस डिजिटल इको‑सिस्टम से न केवल नीति निर्माताओं को सटीक डेटा मिलेगा, बल्कि किसानों को भी मौसम‑पूर्वानुमान, जल‑संचयन के सर्वोत्तम उपाय और बाजार‑सूचना तक आसान पहुँच मिलेगी।
सामुदायिक कार्रवाई को अंतिम कड़ी के रूप में रेखांकित किया गया। सचिव ने कहा कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना कोई भी योजना स्थायी नहीं हो सकती। उन्होंने सुझाव दिया कि ग्राम स्तर पर जल‑संकलन समितियों, किसान समूहों और महिला स्वयंसेवकों को सशक्त बनाकर, स्वामित्व और जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा दिया जाए। इस प्रकार, तकनीकी नवाचार, संस्थागत सुदृढ़ता और सामुदायिक सहभागिता का सम्मिलित मॉडल शुष्क‑भूमियों को उत्पादक और जलवायु‑सहिष्णु क्षेत्रों में परिवर्तित करने की दिशा में एक ठोस कदम साबित होगा।