** आरएसएस की सेवा की सदी भारत की सेवा परंपरा को दर्शाती है: उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन
Naitik Chakravarti Times
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** उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आरएसएस के 100 साल के सामाजिक कार्यों को भारत की प्राचीन सेवा परंपरा के साथ जोड़ते हुए, राष्ट्र निर्माण में उसके योगदान की सराहना की।
** उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने हाल ही में आयोजित एक राष्ट्रीय समागम में कहा कि भारतीय समाज में सेवा की परम्परा सदियों से जीवंत रही है और इस परम्परा को आज आरएसएस ने अपनी सदी‑लंबी गतिविधियों से सुदृढ़ किया है। उन्होंने उल्लेख किया कि 1925 में स्थापित इस संगठन ने शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत और ग्रामीण विकास के क्षेत्रों में अनगिनत पहलें शुरू की हैं, जिनका लाभ लाखों नागरिकों को मिला है। राधाकृष्णन ने कहा कि आरएसएस ने स्वयंसेवकों को स्थानीय स्तर पर संगठित करके स्वच्छता अभियानों, बाल शिक्षा कार्यक्रमों और स्वदेशी उद्यमों को बढ़ावा दिया है, जिससे सामाजिक बंधन मजबूत हुए और आर्थिक सशक्तिकरण को गति मिली।
आरएसएस की सेवा‑केन्द्रित पहलें भारत की प्राचीन ‘सेवा’ की भावना—जो वैदिक ग्रंथों, महात्मा गांधी और स्वराज्य के सिद्धांतों में निहित है—से गहराई से जुड़ी हुई हैं, यह उपराष्ट्रपति ने रेखांकित किया। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने में इस संगठन की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। हालांकि आरएसएस को कभी‑कभी राजनीतिक विवादों और विचारधारात्मक बहसों का सामना करना पड़ा है, राधाकृष्णन ने इस बात पर बल दिया कि सामाजिक कार्यों की वास्तविकता को देखना आवश्यक है, जो विभिन्न वर्गों के बीच सहयोग और सहिष्णुता को प्रोत्साहित करती है।
समारोह में कई सामाजिक कार्यकर्ता, शैक्षिक संस्थान और सरकारी प्रतिनिधि उपस्थित थे, जिन्होंने आरएसएस के विभिन्न प्रोजेक्ट्स की सफलता की कहानियों को साझा किया। उपराष्ट्रपति ने इस अवसर पर सभी स्वयंसेवकों को उनके निरंतर समर्पण के लिए धन्यवाद दिया और भविष्य में भी सेवा के इस परम्परागत मार्ग को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। उनका यह बयान भारतीय समाज में सेवा‑संस्कृति को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा गया।