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कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण: वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण
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कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण: वैश्विक एवं भारतीय दृष्टिकोण

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•27 अक्टूबर 2026 को 07:33 am बजे•0 व्यूज़•2 मिनट पढ़ें

कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) तकनीक वैश्विक जलवायु परिवर्तन से निपटने का एक प्रमुख साधन बनती जा रही है, जबकि भारत इस क्षेत्र में नीति समर्थन और निवेश के साथ सक्रिय कदम उठा रहा है।

कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) वह प्रक्रिया है जिसके तहत औद्योगिक स्रोतों और बिजली संयंत्रों से निकलने वाले CO₂ को पकड़ा जाता है, उसे उपयोगी उत्पादों में बदला जाता है या सुरक्षित रूप से भूमिगत भंडारित किया जाता है। इस तकनीक को वैश्विक स्तर पर 1.5 °C लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अनिवार्य माना जा रहा है, क्योंकि यह कार्बन उत्सर्जन को सीधे स्रोत पर कम करती है और साथ ही ग्रीनहाउस गैसों के स्तर को नियंत्रित करती है।

वर्षों से संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन ढाँचे और पेरिस समझौते ने CCUS को एक प्राथमिक रणनीति के रूप में प्रोत्साहित किया है। यूरोप, अमेरिका और चीन में बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं—जैसे नॉर्वे का नॉर्डस्ट्रीम 2‑CCUS, यूएस का पेनसिल्वेनिया कार्बन कैप्चर प्लांट, और चीन का शेनयांग कैप्चर-टू-फ्यूल प्रोजेक्ट। इन परियोजनाओं ने न केवल तकनीकी व्यवहार्यता साबित की है, बल्कि निवेश के लिए एक स्पष्ट आर्थिक मॉडल भी प्रस्तुत किया है।

भारत में, सरकार ने 2030 तक 10 GW CCUS क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य रखा है, जिसे राष्ट्रीय जलवायु नीति और ऊर्जा रणनीति में शामिल किया गया है। कई ऊर्जा कंपनियों ने पायलट प्रोजेक्ट्स शुरू किए हैं, जैसे कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में CO₂ कैप्चर और इसे रासायनिक एवं पेट्रोकेमिकल उत्पादन में उपयोग करना। इसके अलावा, भारत के कुछ राज्य सरकारें भी भू-भंडारण के लिए अनुकूल भूवैज्ञानिक संरचनाओं की पहचान कर रही हैं।

हालांकि CCUS के व्यापक अपनाने में अभी भी लागत, नियामक ढाँचे और सार्वजनिक जागरूकता जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं, परंतु वैश्विक निवेश में निरंतर वृद्धि और तकनीकी उन्नति से यह स्पष्ट हो रहा है कि CCUS जलवायु लक्ष्यों
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