** क्रिस्टलीय ठोस में असामान्य तरंग‑जैसी ऊष्मा संचार की खोज, अपशिष्ट ऊष्मा को ऊर्जा में बदलने की दिशा में बड़ी सफलता
Naitik Chakravarti Times
••7 व्यूज़•2 मिनट पढ़ें
** वैज्ञानिकों ने क्रिस्टलीय सामग्री में नई तरह की तरंग‑जैसी ऊष्मा संचरण प्रक्रिया की पहचान की, जो औद्योगिक अपशिष्ट ऊष्मा को कुशलतापूर्वक विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने के नए मार्ग खोल सकती है।
** भारतीय विज्ञान संस्थानों के एक सहयोगी अनुसंधान समूह ने हाल ही में क्रिस्टलीय ठोस में एक असामान्य तरंग‑जैसी ऊष्मा संचार तंत्र का पता लगाया है, जिसे परम्परागत फॉनीक (phonon) आधारित थर्मल ट्रांसफ़र मॉडल से अलग माना जाता है। इस खोज में उच्च‑सटीकता वाले अल्ट्रा‑फ़ास्ट लेज़र पल्प्स और न्यूरल‑नेट‑आधारित डेटा विश्लेषण का उपयोग किया गया, जिससे ठोस के अणुजाल में ऊर्जा के प्रवाह को समय‑सापेक्ष रूप से मापा जा सका। परिणाम दर्शाते हैं कि कुछ विशिष्ट क्रिस्टल संरचनाएँ, विशेषकर दो‑आयामी परतदार सामग्रियों में, ऊष्मा को तरंग‑जैसे मोड में संचालित कर सकती हैं, जिससे ऊर्जा हानि न्यूनतम रहती है और थर्मल प्रतिरोध घटता है।
यह खोज औद्योगिक क्षेत्रों में अपशिष्ट ऊष्मा को पुनः उपयोग करने की संभावनाओं को पुनः परिभाषित कर सकती है। वर्तमान में, विश्व स्तर पर भारी उद्योग—जैसे इस्पात, रसायन, और सिमेंट निर्माण—अपनी प्रक्रियाओं में उत्पन्न लगभग 60 % ऊर्जा को ऊष्मा के रूप में खो देते हैं, जो अक्सर उपयोगी ऊर्जा में परिवर्तित नहीं हो पाती। तरंग‑जैसी ऊष्मा संचरण की दक्षता को बढ़ाकर, इन उद्योगों को थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर या हाइब्रिड ऊर्जा प्रणालियों में एकीकृत करने से न केवल ऊर्जा लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी महत्वपूर्ण घटाव संभव होगा। नीति निर्माताओं ने पहले ही इस दिशा में अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष अनुदान योजनाएँ घोषित की हैं, और नई तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर लाने के लिए सार्वजनिक‑निजी भागीदारी मॉडल पर चर्चा चल रही है।
भविष्य में, इस सिद्धांत को विभिन्न क्रिस्टलीय संरचनाओं—जैसे ग्रैफ़ीन‑आधारित हाइब्रिड, टॉपोलॉजिकल इन्सुलेटर, और हाई