वधावन पोर्ट परियोजना को पालघर के गाँववालों का निरंतर विरोध
Naitik Chakravarti Times
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महाराष्ट्र के पालघर जिले में वधावन पोर्ट के विस्तार को लेकर स्थानीय समुदाय ने पर्यावरणीय क्षति और भूमि विस्थापन के ख़तरों को लेकर सख्त विरोध जारी रखा है।
महाराष्ट्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय समुद्री व्यापार को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से शुरू किए गए वधावन पोर्ट परियोजना को पिछले कुछ वर्षों में कई चरणों में मंजूरी मिली है। यह परियोजना राष्ट्रीय ‘सागरमाला’ पहल के अंतर्गत विकसित की जा रही है, जिसका लक्ष्य भारत की समुद्री बुनियादी ढाँचे को आधुनिक बनाना और निर्यात‑आयात को बढ़ावा देना है। योजना के अनुसार, वधावन में एक बहु‑उद्देशीय कंटेनर टर्मिनल, ड्रीजिंग सुविधा और औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किया जाएगा, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक विकास की उम्मीद है। हालांकि, पालघर के कई गांवों में रहने वाले किसान और मत्स्यकर्मी इस विकास को अपनी आजीविका और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा मानते हुए लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। वे मुख्यतः भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, पुनर्वास पैकेजों की अपर्याप्तता और समुद्री पर्यावरण पर संभावित प्रभावों को लेकर चिंतित हैं।
विरोध के स्वरूप में न केवल शांतिपूर्ण मार्च और पिटाई शामिल है, बल्कि कई समूहों ने स्थानीय अदालतों में पर्यावरणीय मंजूरी को चुनौती भी दी है। पर्यावरणीय विशेषज्ञों ने बताया है कि प्रस्तावित टर्मिनल के निर्माण से समुद्री जीवन, विशेषकर मछली के प्रजनन स्थल और समुद्री पक्षियों की आवासीय जगहें प्रभावित हो सकती हैं। इस बीच, सरकार ने पुनर्वास योजना को पुनः समीक्षा करने और प्रभावित परिवारों के लिए वैकल्पिक रोजगार सृजन हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने का वचन दिया है। लेकिन गाँववालों का मानना है कि इन उपायों को लागू करने में देरी और असमान वितरण की समस्या बनी हुई है, जिससे उनका भरोसा घटता जा रहा है।
वधावन पोर्ट परियोजना की आगे की दिशा अभी भी अनिश्चित है। यदि स्थानीय विरोध जारी रहता है तो परियोजना की समयसीमा में देरी और लागत वृद्धि हो सकती है, जबकि सरकार को आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा। इस परिप्रेक्ष्य में, सभी पक्षों के बीच संवाद स्थापित करना और पारदर्शी पुनर्वास उपायों को लागू करना ही इस विवाद को सुलझाने का प्रमुख मार्ग माना जा रहा है।