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** दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता ने क्रेडिट अनुशासन को सुदृढ़ किया, वसूली माहौल को बेहतर बनाया और व्यापार में आसानी को बढ़ावा दिया
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** दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता ने क्रेडिट अनुशासन को सुदृढ़ किया, वसूली माहौल को बेहतर बनाया और व्यापार में आसानी को बढ़ावा दिया

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•2 अक्टूबर 2026 को 04:58 am बजे•7 व्यूज़•2 मिनट पढ़ें

** कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने कहा कि हालिया सुधारों ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) को अधिक प्रभावी बना दिया है, जिससे ऋण वसूली तेज़ हुई है और भारत में व्यापार करने की सुविधा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

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वित्तीय संकट के प्रबंधन के लिए 2016 में लागू हुई दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्टसी कोड – आईबीसी) ने पिछले कुछ वर्षों में कई प्रमुख संशोधनों के माध्यम से अपनी कार्यक्षमता में सुधार किया है। राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने बताया कि हालिया संशोधनों ने ऋणदाताओं की वसूली प्रक्रिया को तेज़ और पारदर्शी बनाया है, जिससे बैंकों और वित्तीय संस्थानों को बकाया रकम की पुनः प्राप्ति में अधिक भरोसा मिला है। इस दिशा में, कोर प्रक्रिया में समय सीमा को घटाया गया, पुनर्संरचना के लिए स्पष्ट मानदंड स्थापित किए गए और प्रतिवादी कंपनियों के लिए अधिक सख्त दंडात्मक प्रावधान लागू किए गए। इन कदमों ने न केवल बैंकों की बैलेंस शीट को स्वस्थ किया है, बल्कि निवेशकों के विश्वास को भी पुनर्स्थापित किया है।

इन सुधारों का प्रभाव व्यावसायिक माहौल पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। आईबीसी के तहत मामलों की तेज़ समाधान दर ने उद्यमियों को अनिश्चितता से मुक्त किया, जिससे नई परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करना आसान हो गया। व्यापारियों ने बताया कि अब ऋण की मंजूरी प्रक्रिया में देरी कम हुई है और ऋणदाता अधिक सक्रिय रूप से क्रेडिट प्रदान कर रहे हैं। यह सुधार भारत को विश्व व्यापार मंच पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्रदान करता है, जहाँ आसान वसूली और सुदृढ़ क्रेडिट अनुशासन को निवेशकों द्वारा महत्वपूर्ण मानदंड माना जाता है। कुल मिलाकर, आईबीसी में किए गए नवीनतम परिवर्तन न केवल वित्तीय स्थिरता को सुदृढ़ करते हैं, बल्कि देश में व्यापार करने की सुविधा को भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ाते हैं, जिससे भारत की आर्थिक वृद्धि की गति तेज़ होने की उम्मीद है।
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